RAJ KAMAL - कांतिलाल गोडबोले फ्राम किशनगंज

सोचो ज़रा हट के

203 Posts

6518 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 1662 postid : 1576

“मेरे स्वर्गीय पूज्यनीय पिता जी की अनमोल और अमिट यादे”

Posted On: 18 Jun, 2012 में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

पिछले साल भी अपने फादर पर फादर्स डे को उन पर समर्पित एक लेख लिखा था ….. इस साल भी सोचा की कुछ ना कुछ तो पिता जी पर जरूर लिखा जाए….. लेकिन आप तो मेरी फितरत को जानते ही है की मैं ऐसी  मस्त -२ महा कुत्ती चीज हूँ   जिसकी दुम  हमेशा  टेढ़ी ही रहती है ….. जोकि हमेशा ही कुछ नया करने के मूड में रहता है …. लेकिन इसे मेरी मज़बूरी कहिये या फिर धर्म संकट की मेरे पिता जी सिर्फ एक ही है और उन पर मैं पिछले साल ही लिख चूका हूँ …. मेरी दुविधा तब खत्म हुई जब मैंने जागरण की इसी विषय पर ब्लॉग देखा ….. वोह बिलकुल पिछले साल वाला था , यहाँ तक की उस पर आई हुई पुराणी प्रतिक्रियाओं के साथ …. इसलिए मैंने भी अपने पिता जी पर लिखने का मन बनाया लेकिन कुछ अलग अंदाज़ में ……

यह  मेरे स्कूल के दिनों की बात है की पता नहीं  मेरे स्वर्गीय पिता जी मेरे पूज्यनीय दादा जी की वंशानुगत खानदानी परम्परा कों निभा रहे थे या फिर मेरे दादा जी के द्वारा किये गए जुल्मों सितम का बदला मुझको पीटकर अपनी खानदानी- गुंडागर्दी को आगे बढ़ा रहे थे …. लेकिन मैंने इस खानदानी गुंडागर्दी वाली परम्परा को तोड़ दिया ….. मैंने इसके लिए अपनी शादी और बच्चे होने का इंतज़ार नहीं किया बल्कि अपने पिता जी से खाई हुई मार का सिला मैं अपने से छोटे भाई बहनों कों पीट कर लेने लगा  था ….. लेकिन जब मैं रात कों उन मासूमो कों सोए हुए देखता तो उन पर तरस आता और  मन में बहुत ही पश्चाताप होता कि मैं इनको इतनी बेदर्दी से काहे को पीटता हूँ …..  भगवान का शुक्रिया भी अदा किया करता कि हे भगवान ! शुक्र  है कि तुमने मुझको सभी भाई बहनों में सबसे ऊपर के नम्बर पर रखा ….. अगर मैं छोटा होता और इनमे से कोई बड़ा होता , और मेरे जैसा व्यवहार मुझसे करता तो क्या मैं सहन कर लेता , कदापि नहीं …….

एक बार अपने पिता जी से बचपन मैं रुष्ट होकर घर से भाग तो गया लेकिन यह समझ नहीं आये कि जाऊं तो कहाँ पर जाऊं ….. खैर गनीमत रही कि थोड़ी दूर पर बाज़ार के बगल वाली किसी गली में से मुझको सांझ होने से पहले ही घर वालो द्वारा ढूंड लिया गया ….. मेरे गुस्से कों देखते हुए माँ ने (उपरी मन से ) कहा कि तुम्हारे पिता जी बहुत ही ज़ालिम है , अब हम दोनों यहाँ पर नहीं रहेंगे , दूर कहीं चले जायेंगे ….. मेरे मन के हरिआले ज़ख्मो को थोड़ी बहुत  राहत मिली और उसके बाद मैं हर रोज ही अपनी माता श्री से यह आशा रखने लगा कि वोह घर छोड़ कर मुझको दूर कहीं ले जाए ….. लेकिन मेरी यह आशा कभी भी पूरी नहीं हुई …..

इसे मेरे पिता जी की बदकिस्मती कहिये या फिर महिलाओं की खुशकिस्मती की सभी के बीच में मेरे पिता जी की एक शरीफ इंसान की इमेज थी …. जहाँ पर बाकी मर्दों के अपने सामने आ जाने मोहल्ले की औरते पर्दा कर लेती थी + सहम जाया करती थी + बहनों का आकाशवाणी प्रोग्राम खत्म करके उठ कर अपने -२ घर को चली जाया करती थी …… वहीँ पर मेरे पिता जी के अपने सामने आने पर कोई भी ना तो घबराती और ना ही पर्दा करती और ना ही उनकी महफ़िल बर्खास्त होती और उनका तप्सरा ऐ हिन्द बदस्तूर जारी रहता …. अगर मेरी माता जी यह कहते हुए महफ़िल से उठने की कोशिश करती की राजकमल के पिता जी को चाय पानी पिला दूँ , अगर देर हो गई तो वोह खफा होंगे ….. वोह तुरंत ही माता जी को यह कहते हुए फिर से बिठा लेती बहिन जी आपके वोह ऐसे लगते तो नहीं खफा होने वाले……  मेरी माता श्री को तो बैठने को कहा जाता लेकिन मुझको यह कहते हुए की यह रन्नो में धन्ना कहाँ से आ गया , जाने के लिए कहने पर भी मैं वहीँ पर अंगद के पाँव की तरह से जमा रहता ….. मेरा आज का स्वभाव शायद उस समय की संगति के कारण ही है ….

पिता जी के जिन्दगी जीने के असूल बड़े ही सीधे सादे थे …..  वोह घर में मेरी माता श्री जी को तो दुनिया भर की गालियाँ निकालते , लेकिन अपने श्वशुर यानि की मेरे नाना जी के सामने बिलकुल गरीब गाय बन जाते ….. माँ चाह कर भी कभी भी पूज्य पिता जी की असली हरकतों की शिकायत मेरे नाना श्री जी से नहीं कर पाई …. करती भी कैसे ? उसकी बातों का विश्वाश कौन करता …..सारी उम्र मेरे पिता जी मेरे नाना जी के लाडले + हीरे जैसे दामाद बने रहे ….. मेरे नाना श्री मेरे पिता जी की इतनी तारीफ किया करते थे की ईर्ष्यावश मेरी माँ का कलेजा छलनी-२  हो जाता ….. उसको कवर अप करने के लिए मेरे नाना जी को कहना पड़ता की मेरी यह वाली बेटी तो साक्षात लक्ष्मी है , जब भी यह आती है घर में धन की वर्षा होने लग जाती है …..

नाना जी और पिता जी में बहुत ही  गहरी आपसी समझदारी थी जिसके कारण उन दोनों के बीच में इतना घालमेल भरा आपसी तालमेल बन गया था की मेरे इस दुनिया में अवतार लेने के एक हफ्ते पहले ही  मेरी सबसे छोटी मौसी जी का जन्म हुआ ….. मेरे मामा जी ननिहाल संभाल रहे थे तो मेरी मासी जी हमार घर …… बेटी के लिए पंजीरी बनाने वाली नानी जी को को खुद ही पंजीरी खाने की मज़बूरी + जरूरत होने  के कारण इस नेक कार्य को पड़ोसियों ने अंजाम दिया …… लोगों को तथा नाते – रिश्तेदारों को यही समझ में नहीं आ रहा था की श्वशुर शर्मा जी को बेटी पैदा होने की बधाई दी जाए या फिर नाती पैदा होने की , दामाद जी को बेटा पैदा होने की बधाई दी जाए या फिर साली के पैदा होने की ….. लेकिन फ्री का माल खाने वाले सभी चटोरे अन्दर से बहुत ही ज्यादा खुश थे की अब तो दोनों तरफ से डबल पार्टी खाने को मिलेगी …..

लेकिन मेरे स्कूल की समाप्ति तक मेरे पिता श्री और मेरे बीच एक अजीब सी समझदारी कायम हो चुकी थी ….. हमारी पसंद और नापसंद लगभग एक समान थी …… हमारे बीच जेनरेशन गैप ना के बराबर था , इसीलिए जब मैं पहले दिन कालेज जाने वाला था तो पिता जी ने अपनी खानदानी शराफत और इमानदारी का  ढ़ोल यह कहते हुए मेरे गले में बाँध दिया की बेटा एक बात का ध्यान रखना की तुम मांगलिक हो….. इतना सुनना था की लड़कियों को कालेज में छेड़ने और घूरने तथा कमेन्ट्स करने के बचपन से बुने हुए मेरे सारे के सारे सपने एक ही पल में धाराशाई हो गए ….. पता नहीं पिता जी को मुझ पर इतना भरौसा क्यों था की अगर मैं किसी लड़की से टांका भिड़ाउंगा तो उससे शादी भी करूँगा ही …… कभी कभार तो दिल इतना दुखी हो जाता की मैं यहाँ तक सोचने लग जाता की अपने गले में एक तख्ती लटका लूँ की मैं मांगलिक हूँ इसको पढ़ने के बाद कोई तो मांगलिक लड़की पट ही जायेगी ….. मैं  ही जानता हूँ की वोह तीन साल मैंने कालेज में किस तरह सब्र के घूंट पीते हुए निकाले ….. मुझे सर आइंस्टीन  के  ऐतहासिक उदगार हर समय याद आते रहे जिनकी तर्ज पर मैं भी कह सकता हूँ की मुझको ऐसा लगता है की एक भरा पूरा समुन्द्र मेरे सामने पड़ा हुआ है और मैं उसमे रहते हुए भी खुद को प्यासा महसूस करता हूँ….. मैं चाहे जितना भी इसको समझ लूँ वोह हर हाल में हमेशा कम + नाममात्र ही रहेगा ……

अपने स्वर्गीय शरीफ बाप की अल्पज्ञानी शरीफ औलाद

राजकमल शर्मा

“मेरे स्वर्गीय पूज्यनीय पिता जी की अनमोल और अमिट यादे”

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (3 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

26 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

D33P के द्वारा
July 22, 2012

नमस्कार . राजकमल जी, आपकी दिवंगत पिताश्री को दी गई श्रधान्जली …..के बाद की पोस्ट तो मैंने पढ ली थी पर शायद समयाभाव और विदेश प्रवास के कारण इसे नहीं देख पाई थी और वापिस आने पर आपकी नवीनतम पोस्ट ही देखी जिसके लिए क्षमा चाहूंगी …….. आपकी लेखनी तो लाजवाब है ही पर ये लेख तो कमाल का है ,एक उदंड बालक के विचार, स्मृतियों के गहरे भावो को जितनी सफाई से आपने बयाना किया है , शायद कोई दूसरा नहीं कर पाता ! स्वर्गीय व पूजनीय पिताजी को श्रद्धासुमन

    Rajkamal Sharma के द्वारा
    July 26, 2012

    आदरणीय दीप्ती बहिन जी …. सादर अभिवादन ! मैंने अपने इस लेख को मनोरंजक बनाने के लिए तथ्यों में कुछेक छेड़छाड़ की है *मेरी सबसे छौटी वाली मौसी जी और मेरी उम्र में एक सप्ताह का नहीं बल्कि एक साल का अंतर है *मैं हद से ज्यादा जिद्दी था और खुद को किसी राजकुमार से कम नहीं समझता था शायद इसी कारण पांचवी क्लास में अपने पिता जी की थोड़ी सी झिड़की मिलने पर ही घर से निकल गया था आपने लेख को सराह कर मेरा उत्साहवर्धन किया उसके लिए आपका तहेदिल से शुक्रगुजार हूँ ….. (देरी से उत्तर के लिए क्षमा -आपके पिछले ब्लॉग पर भी मेरी एक प्रतिकिर्या उत्तर के इन्तजार में है )

Ramesh Bajpai के द्वारा
July 13, 2012

प्रिय पुत्तर आपकी स्मृतियों के गहरे भावो को महसूस कर सुखद अनुभूति हुयी | भावो की इस अमूल्य निधि को हम सब से साझा कर अपने उपकृत कर दिया है | बधाई ,आशीर्वाद ,शुभकामनाये |

    Rajkamal Sharma के द्वारा
    July 13, 2012

    आदरणीय वाजपेई जी …. सादर प्रणाम ! मेरे मन के “इस तरह के विचारों को भी” आप ने समझा और सराहा इसके लिए आपका दिल से आभार आप का आना अच्छा लगा आदरणीय शाही जी तो इस मंच पर विराजमान है ही अब आपके भी आ जाने से गरिमामय माहौल फिर से बनेगा दिल से शुक्रिया

vinitashukla के द्वारा
June 22, 2012

अपनी रोचक शैली में आपने, अपने पिताजी के प्रति जो उदगार प्रकट किये हैं; पठनीय हैं. इस सुंदर भावांजलि हेतु बधाई.

    Rajkamal Sharma के द्वारा
    July 13, 2012

    आदरणीय विनीता जी ….. सादर अभिवादन ! आपसे हमेशा ही प्रोत्साहन मिला है जिसके लिए तहे दिल से आभारी हूँ आपका देरी से उत्तर के लिए क्षमा

June 20, 2012

सादर प्रणाम! क्या खूब अंदाज है ……………आम जुबान में भावनाओ का नेचुरल अभिव्यक्ति ………….खट्टा-मिट्ठा हास्य व्यंग्य …………………..

    Rajkamal Sharma के द्वारा
    June 20, 2012

    प्रिय अनिल जी …… सप्रेम नमस्कारम ! अगर मैंने इस तरह से लिखा है तो इसका यह मतलब नहीं की वास्तव में ही मेरी भावनाए इसी तरह की है …. एक पिता का जो स्थान और योगदान आप सभी के जीवन में है उसी से मिलता जुलता मेरे जीवन में भी रहा है …. आप एक नए ब्लागर होने के बावजूद इसको पढ़कर भर्मित नहीं हुए + कोई गलत धारणा नहीं पाली …. इस आपसी समझ के लिए मैं आपका हार्दिक आभारी हूँ

allrounder के द्वारा
June 20, 2012

नमस्कार प्रिय भाई राजकमल जी, अपने पूजनीय पिताजी को भी आपने अपने ही अलग अंदाज मैं याद किया, और अपनी बचपन की स्मृतियों को फिर से स्मरण किया इसके लिए आभार !

    Rajkamal Sharma के द्वारा
    June 20, 2012

    प्रिय सचिन भाई …… सप्रेम नमस्कारम ! अगर आप सभी के तरीके से याद किया होता तो ज्यादातर अपने आंसू ही पोछ रहे होते ….. शायद उस रूप में भी लिख पाऊं कभी …. क्योंकि इस तरह के तरीके को तो पुराने परिचित ही समझ सकते है , नए लोग तो भ्रमित हो सकते है आसानी से ….. आपने मुझको समझा उसके लिए आपका दिल की गहराईयों से आभार

alkargupta1 के द्वारा
June 19, 2012

राजकमल जी , आपने अपने स्वर्गीय व पूजनीय पिताजी की अनमोल व अमिट स्मृतियों को अपनी शैली में एक अलग रूप में व्यक्त किया है…..उन्हें मेरा श्रद्धावनत नमन

    Rajkamal Sharma के द्वारा
    June 20, 2012

    आदरणीय अलका जी ….. सादर प्रणाम ! उनकी किसी भी खासियत और गुण को इस लेख में सांझा नहीं कर पाया हूँ …. कोशिश करूँगा की अगली बार उनके वास्तविक रूप से सभी को परिचित करवा पाऊं ….. लेख को पसंद करने , बल्कि उससे भी कहीं ज्यादा समझने के लिए आपका बहुत -२ आभारी हूँ

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
June 19, 2012

आदरणीय राजकमल जी,सादर.आपने अपने दिवंगत पिताश्री की स्मृतियों का वर्णन बिलकुल अपने अंदाज में किया है.यही तो आपकी खूबी है.वैसे मांगलिक होना कोई अलग बात नहीं.मुझे इन सब में विश्वास नहीं. लेकिन जिस रोचकता से आपने वर्णन किया है लगता है आँखों के सामने घटित हो रहा हो.मुझे तो आपके और उर्दू की मशहूर लेखिका इस्मत चुगताई के लिखने के अंदाज में बहुत समानता दिखाई देती है.भगवान आपके पिताश्री की आत्मा को शांति दे.

    Rajkamal Sharma के द्वारा
    June 20, 2012

    आदरणीय राजीव जी ….. सादर अभिवादन ! जिस तन लागे वोह ही जाने गैर क्या नये प्रीत पराई पहले जुबां पर शादिया होती थी ….. मेरी भुआ जी की शादी मांगलिक लड़के से करनी पड़ गई थी ….. दो बच्चों के ज़न्म के बाद एक दिन रात को उसको यमदूत उपर ले गए किसी और के भरम में , वहां यह भी पता चला की दो दिन के बाद पास के गाँव में इसी नाम के किसी दूसरे आदमी को लेकर आना है …. यह बात उन्होंने कसम देकर अपने एक सहयोगी को ही बतलाई थी जिसने की उनकी म्रत्यु के बाद इस रहस्य को उजागर किया था ….. इसलिए हमारे खानदान में उसके बाद किसी भी मांगलिक की शादी साधारण से नहीं हुई …. इस्मत चुगताई जी को पढ़े हुए एक मुद्दत हो गई है , उनका मैं बहुत बड़ा फैन हूँ ….. लेकिन खुशवंत सिंह को मैं आज तक लगातार पढ़ रहा हूँ …. स्वर्गीय कन्हैया लाल कपूर और पंजाब केसरी के लेखक स्वर्गीय सरदार सिंह पागल आदि का शायद सम्मिलित असर हो मेरे लेखन में …… आपको ढेरो धन्यवाद

jlsingh के द्वारा
June 19, 2012

आदरणीय महोदय, नमस्कार! चाचाश्री को श्रद्धासुमन और गुरुदेव को प्रणाम! मांगलिक होने से क्या होता है प्रभु??? एक आशंका है…….

    Rajkamal Sharma के द्वारा
    June 20, 2012

    आदरणीय जवाहर लाल जी ….. सादर अभिवादन ! अगर पति और पत्नी दोनों में से कोई एक मांगलिक हो तो दोनों में से किसी एक की असमय ही अकाल म्रत्यु होने की प्रबल सम्भावना रहती है …. हमारे मोहल्ले में तो लड़का लड़की का घूँघट उठाने से पहले ही भाग गया था , इतने प्रबल ग्रह थे लड़की के …. लेकिन जब बाद में उसकी शादी (तलाक के बाद- पुलिस वालों की सहानभूति भी लड़की पक्ष की बजाय लड़के से थी , उसके हाल के कारण ) किसी दूसरी साधारण लड़की से करवाई गई तो आज तक सभी कुछ ठीक थक चल रहा है ….. एक दूसरी घटना :- पहले जुबां पर शादिया होती थी ….. मेरी भुआ जी की शादी मांगलिक लड़के से करनी पड़ गई थी ….. दो बच्चों के ज़न्म के बाद एक दिन रात को उसको यमदूत उपर ले गए किसी और के भरम में , वहां यह भी पता चला की दो दिन के बाद पास के गाँव में इसी नाम के किसी दूसरे आदमी को लेकर आना है …. यह बात उन्होंने कसम देकर अपने एक सहयोगी को ही बतलाई थी जिसने की उनकी म्रत्यु के बाद इस रहस्य को उजागर किया था ….. इसलिए हमारे खानदान में उसके बाद किसी भी मांगलिक की शादी साधारण से नहीं हुई …. आपको तहे दिल से शुक्रिया

चन्दन राय के द्वारा
June 18, 2012

राजकमल साहब , इस कलयुग में इतने प्रकांड ग्यानी ध्यानी पिता पाने का सौभाग्य , आपको सायद पिछले जन्म के पापों से ही मिला , ज्यादा न कहते हुए आपके पिता के गुणगान का मंगलाचरण कर लूँ !

    Rajkamal Sharma के द्वारा
    June 20, 2012

    प्रिय चन्दन जी …… सप्रेम नमस्कारम ! आपकी नवीनतम पोस्ट अपनी प्रतिकिर्याओ के साथ कहाँ गायब हो गई है ….. किसी थाणे में कोई रिपोर्ट लिखवाई की नहीं अभी तक ?….. पिता जी का तो पता नहीं की क्यों मिलाप हुआ था , लेकिन बीवी अभी तक पिछले जन्म के पापों के कारण नहीं मिल सकी है …. बहुत -२ शुक्रिया

surendr shukl bhramar5 के द्वारा
June 18, 2012

पीट पीट कर इतना सुन्दर चिकना घड़ा बनाने के लिए हमारे पूजनीय चाचा श्री को नमन ..जब हम दसवें ग्रह की खोज में जायेंगे तो एक बार फिर ऐसा गढ़ेंगे की वो आप से मिलने छड़ी लिए आ जाएँ अच्छा हुआ छोटे बाबू नहीं बने नहीं तो बदला लेने की तमन्ना दिल में धंसी रहती कहाँ उतारते ? आप की शादी के गढ़ नक्षत्र सब को पहले से ही परेशां करते रहे ..मांगलिक हो शायद बचे रहे अब तख्ती मत ही लटकाइयेगा …. आप के चुटीले काबिले तारीफ़ लेख ने बहुत हंसाया गुरुदेव …..जय श्री राधे भ्रमर ५

    Rajkamal Sharma के द्वारा
    June 20, 2012

    आदरणीय भ्रमर जी ….. सादर प्रणाम ! यह ठीक है की बड़े होने का यह फायदा तो होता है की हाथों की कसरत हो जाती है और मन का गुब्बार भी निकल ही जाता है …. लेकिन बेचारे छोटे मन में ही घुटते रहते है + कसमसाते रहते है ….. पिता जी के देहान्त के बाद मुझको समझ में नहीं आ रहा था की उन पर सख्ती करूँ या प्यार करूँ ….. लेकिन फिर मैंने सख्ती की बजाय “नज़र” रखने और बन्दिशो की बजाय छूट देने का फैसला लिया ….. बड़े होने की अपनी जिम्मेवारिया भी होती है ….. आप दसवे ग्रह पर अपनी जिम्मेवारी को मत भूल जाइयेगा ….. आपका दिली शुक्रिया

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
June 18, 2012

आदरणीय राज कमल जी, सादर अभिवादन सर्व प्रथम पूजयति पापा , बाबा , दादा को प्रणाम वंश बढ़ाया सब घर ने आप काहे हो निष्काम आप दरोगा बने भैया कैसे जान लेते हो भाव आप मंगली भोलू भी मंगली कैसे दावत खाव आपके पापा हमरे पापा दोनों गुण की खान कहाँ लो भैया किस्से उनके करियो बखान बहुत सुन्दर लेख , पापा के आदर्श ही यहाँ तक पहुचाये हैं. बधाई.

    Rajkamal Sharma के द्वारा
    June 20, 2012

    पूज्यनीय कुशवाहा जी ….. सादर प्रणाम ! दुःख की बात यह नहीं है की भोलू मांगलिक है बल्कि दुःख की बात तो यह है की निर्मल बाबा जी का प्रोग्राम बैन हो गए है क्योंकि मैंने सुना है की जो उनमे श्रद्धा भावना रखता है उसके मंगल दोष का निवारण हो जाता है …. फिर भी भगवान से प्रार्थना है की उसका हमेशा ही शुभ और मंगल हो आपका तहेदिल से आभार

akraktale के द्वारा
June 18, 2012

आदरणीय राजकमल जी नमस्कार, आपके पिताजी के चरित्र से कई बाते सीखने को मिली, किन्तु क्यों नहीं वे आपके चरण पालने में देख पाए, वरना आपका बाल विवाह तो निश्चित ही कराते.

    Rajkamal Sharma के द्वारा
    June 20, 2012

    आदरणीय अशोक जी ….. सादर अभिवादन ! आपने अनजाने में ही एक अटल सच्चाई को ब्यान किया है ….. मेरे पूज्य पिता जी के असमी परलोक गमन का सबसे बड़ा नुक्सान मुझको ही हुआ है नौकरी और विवाह के मामले में खास करके ….. आपका आभारी हूँ

dineshaastik के द्वारा
June 18, 2012

अनमोल  यादें अब तक  ज्यों का त्यों सजा कर रखा किसी नई  नवेली दुल्हन की तरहा। आपकी अनोखी नई शैली विवश  करती है आपके आलेखों को दुबारा पढ़ने के लिये। आपकी खाशियत  विषय  बदलते हुये भी रचना के पूर्व  के शब्दों से संबंध  नहीं टूटता। बधाई…रचना..की ….प्रस्तुति…के…लिये…

    Rajkamal Sharma के द्वारा
    June 20, 2012

    आदरणीय दिनेश जी ….. सादर अभिवादन ! मेरी गलती की और अपने अंदाज़ में इशारा करके बताने के लिए आपका हार्दिक आभार ….. अब आपकी शिकायत को दूर करते हुए इस लेख में अपनी तरफ से यथा संभव बदलाव करने के प्रयास किये है …. उम्मीद करता हूँ की यह कोशिश आपको पसंद आएगी , धन्यवाद


topic of the week



latest from jagran