RAJ KAMAL - कांतिलाल गोडबोले फ्राम किशनगंज

सोचो ज़रा हट के

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ऐ काश की हम आदमजात न होकर कोई भी जानवर होते !

Posted On: 1 Oct, 2010 में

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ऐ  काश की हम आदमजात न होकर कोई भी जानवर होते…

न होता कोई जाति – पाति का बन्धन

सोचते हमेशा तन की क्योंकि नहीं होता तब कोई मन….

न होता यारो को तब कोई ऊँच और नीच का भेद

रिश्तों की मर्यादा भंग होने पर तनिक भी न होता खेद…

जो भी मन में आता बड़े शौंक से वो ही कर जाते

जिससे भी दिल चाहता उसी संग हम  रास रचाते …

गोरी या काली का कोई भी नखरा नहीं होता

अंधी – कानी और लंगड़ी या लूली का भी कोई खतरा नहीं होता ….

शादी से पहले दहेज का ना कोई लेना और देना  होता

शादी के बाद जलने का भी कोई खतरा ना होता….

बिना तलाक दिए ही हम नित नई -२ शादिया रचाते

जो काम अब नहीं है कर सके वोह सब ही तब कर जाते…

हर गली और मोहल्ले के बच्चो के हम पापा कहलाते

जिस भी गली मोहल्ले से गुजर जाते सभी बच्चे पापा -२ चिल्लाते….

अपने बच्चो को पढाने के झंझट से हम बच जाते

कई बच्चो के माँ –बाप बन कर ही वोह लायक बन जाते …

हमारी हर बीवी के कई – २ पति होते

और हम  कई -२ बीविओ  के पति हो जाते ….

हर नर जानवर ही असल में एक असली मर्द होता है

अजी साहब जानवरों में भी कभी कोई नामर्द होता है ….

(कोई पत्थर या छड़ी से मत मार देना हमको

कयोंकि इस मर्द को तो दर्द होता है …)

ग्लोबल वार्मिंग का असली फायदा अब तो जानवर  पूरा – २ है  उठाते

पहले केवल सर्दी में लेकिन अब तो हर मौसम में पिल्लै है नज़र आ जाते ….

आज का आदमी जो कहीं  जानवर से भी बदतर हो चला है

देख कर उसके रंग और ढंग हर समझदार जानवर भी शर्मशार हो चला है …

जानवर होकर भी हम इंसान को प्यार से जीना सिखलाते

वैर भाव मिटा कर प्यार की इक नई दुनिया बसाते…

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21 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rita singh ;sarjana' के द्वारा
October 3, 2010

राजकमल जी , ” आज का आदमी जो कहीं जानवर से भी बदतर हो चला है देख कर उसके रंग और ढंग हर समझदार जानवर भी शर्मशार हो चला है … जानवर होकर भी हम इंसान को प्यार से जीना सिखलाते वैर भाव मिटा कर प्यार की इक नई दुनिया बसाते…” सुन्दर भाव बधाई l

    rajkamal के द्वारा
    October 3, 2010

    आदरणीय सर्जना जी …. कभी एक गाना सुना और गुनगुनाया करते थे की … दुनिया के लोग कितने अच्छे होते … सारे के सारे जो छोटे बच्चे होते … लेकिन अफ़सोस की आज समझाने के लिए बच्चो की जगह जानवरों की मिसाल देनी पड़ रही है … कविता पसंद करके प्रतिकिर्या देने के लिए आपका बहुत -२ आभार

y.dubey के द्वारा
October 2, 2010

प्रिय राजकमल जी , मैंने चातक जी को उद्येश्य से न भटकने को इसलिए कहा था क्यूंकि ये उन चुनिन्दा लोगो में से है जिन्हें की मै साहित्यकार की श्रेणी में रखता हूँ , और ये मैंने इसलिए कहा क्यूंकिचातक जी से एक उम्दा रचना की अपेछा करता हूँ और मै निराश हुआ था मैंने कही भी ये नहीं कहा की विरोध मत करो परन्तु विरोध कमेंट्स के रूप में भी हो सकता था, बात नाम बदलकर अनर्गल टिपण्णी की है तो मुझे लगता है की आपको व्यंग छोड़कर जासूसी उपन्यास लिखने चाहिए , (क्योंकि इनकी टिपण्णी से यह आभास होता है की इन्होने सभी की टिप्पणियो के हो लेने का इंतज़ार किया …उसके बाद सोच समझ कर अपने मन का मैल और गंदगी का आपके ब्लाग पर वमन कर दिया) यह क्या है महोदय संजीव जी का विरोध इन्ही आधारों पर कर रहे है की वो अशभ्य तरीके से पेश आते है. चातक जी की कुछ शब्द इसी लेख से आपके लिए उपयुक्त लगी… “जवाब देते समय महोदय के तर्क हवा खाने चले गए और संयम की शिक्षा देने वाले मूर्धन्य विद्वान महोदय बौखला कर तर्क करने वाले सभी ब्लागरों के साथ अशोभनीय तू-तड़ाक करने पर अमादा हो गए-”

    rajkamal के द्वारा
    October 2, 2010

    वाह ! दूबे साहब … सुभानल्लाह … अजी साहब आप अपनी गलत बात को सही सिद्द करने पे क्यों तुले हुए है ? आप इन सब बातो से आखिर क्या साबित करना चाहते है ? यह मुझ कमबख्त की समझदारी से परे की बात है …. या फिर मेरी समझदानी की छलनी जरा ज्यादा ही मोटा छानती है… मैं जो हू वोह सो हू … मुझे उसके लिए किसी से भी कोई प्रमाणपत्र लेने की जरूरत नहीं है …. अगर कल को आप मेरी झूठी तारीफ करके मुझे चने के झाड़ पे बिठा देंगे तो क्या मैं अपनी औकात भूल जायूँगा …कदापि नहीं … अब आप चातक जी को और मुझको किसी श्रेणी में रखे …यह तो आप की कथनी हुई …. और जो आपने टिप्पणी की …वोह आप की करनी हुई …. अब आप यह एक नया शिकवा लेकर सामने आ गए है की किसी असयमी को सयम का भूला हुआ पाठ याद करवाने के लिए लेख नहीं बल्कि टिपण्णी लिखनी चाहिए थी …. उसके बारे में यही कहना चाहता हूँ की …. १.हम सबमे यह एकमत से यह सहमती बनी थी की उनके ब्लाग पर अब कोई अपनी इज्जत का कचरा करवाने नहीं जाएगा … २.उनके ब्लॉग पर अब और कोई टिपण्णी कर के उनको कोई अहमियत नहीं दी जायेगी … ३.और सबसे अहम बात की …चातक जी ने वोह लेख लिखने से पहले सभी ब्लोगर्स की राय और समर्थन माँगा था …. ४.ज्यादातर ब्लोगर्स ने (मेरे समेत ) खुले मन से उनको वोह ब्लॉग लिखने के लिए प्रार्थना की थी … ५.तो इसलिए वोह केवल उनका ही नहीं ..बल्कि ज्यादातर ब्लोगर्स का भी मत था … ६.कयोंकि उन्होंने उसी प्रस्तावना के साथ ही अपना लेख जोड़ दिया था …इसलिए सारी टिप्पणिया इकट्ठी हो गई ….जिससे शायद आपको ज्यादातर ब्लोगर्स का उनको पहले दी गई अनुमति और बाद में दिया गया सहयोग + समर्थन अलग -२ नज़र नहीं आ पाया … वैसे मै ज्यादा बहस में नहीं पड़ता ….अगर फिर भी आपकी कोई शंका बाकी रह गई हो तो आपका स्वागत है …

    Anis के द्वारा
    November 28, 2013

    I don’t know who you wrote this for but you helped a bretohr out.

atharvavedamanoj के द्वारा
October 1, 2010

अरे वाह राजकमल जी मजा आ गया..वन्देमातरम ..लेकिन मित्र…जाति पाति और धर्म का पालन तो जानवर भी करते हैं ..यहाँ मैं आपसे सहमत नहीं हूँ ..territoriality in animals मैंने मनोविज्ञान में पढ़ा है…और इसी अवधारणा ने गंध विज्ञानं में योगदान भी किया है…हां यह बहुत ही अच्छा बन पड़ा है ग्लोबल वार्मिंग का असली फायदा अब तो जानवर पूरा – २ है उठाते पहले केवल सर्दी में लेकिन अब तो हर मौसम में पिल्लै है नज़र आ जाते ….जय भारत,जय भारती…आपका व्यंग वास्तव में बेजोड़ है

    rajkamal के द्वारा
    October 1, 2010

    प्रिय मनोज जी …वन्देमातरम मैंने जो लिखा कुछ समझ से नहीं लिखा (दिमाग से ) बस सोच कर लिखा …. आपने जो भी पढा …वोह ..हो सकता है की शाश्वत सत्य हो …. इससे केवल मेरा ही नहीं और बहुतो का भी ज्ञानवर्धन हुआ होगा निशचित रूप से … उस समय मेरे दिमाग में लुप्त हो रहे सफेद बाघ आये थे …. जब वैज्ञानिको ने एक से पहले बच्चे पैदा करवाए …फिर उसी की बेटी से उसके बच्चे पैदा करवाए … मैंने इसको इतनी गहराई से नहीं बल्कि केवल हलके फुल्के तरीके से मनोरंजन के उद्देश्य से ही लिखा था … धन्यवाद

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
October 1, 2010

राज भाई………. जानवर होने के लिए आपके द्वारा दिए तर्क वाकई लाजवाब हैं……….. रोचक लेख के लिए हार्दिक बधाई………..

    rajkamal के द्वारा
    October 1, 2010

    पियूष भाई ! नमस्कार शुक्र है की आपने मेरा साथ दिया …. आपको भी मेरी तरह नुक्सान की बजाय फायदे ज्यादा नज़र आये …. लेकिन फिर भी आदमी (इंसान )होना उस खुदा की सब से बड़ी नेमत है … शुक्रिया

chaatak के द्वारा
October 1, 2010

प्रिय राजकमल जी, आपके इस रैप सांग को पढ़कर बड़ा अच्छा लगा| आपके लेखों में यही प्रवाह निरंतर दिखता आया है और आज इस रचना को पढकर य़कीन हो गया कि आप एक बहुत ही अच्छे रैप राइटर हैं| बधाई हो!

    rajkamal के द्वारा
    October 1, 2010

    प्रिय चातक जी … नमस्कार ! अब आप जितनी प्रतिभा तो हर किसी में नहीं हो सकती … यह सभी लोगो ने आपने तलवार के जोर पर धर्म लेख पर देख लिया … जिस काम का बीड़ा आपने उठाया और उसे बखूबी अंजाम भी दे दिया… वोह कोई दूसरा शायद ही कर सकता था …. आपके उस लेख ने इस सरे जागरण मंच के बिगड़े हुए सुर और ताल को दरुस्त किया … धन्यवाद

chaatak के द्वारा
October 1, 2010

प्रिय राजकमल जी, आपके इस रैप सांग को पढ़कर बड़ा अच्चा लगा| आपके लेखों में यही प्रवाह निरंतर दिखता आया है और आज इस रचना को पढकर य़कीन हो गया कि आप एक बहुत ही अच्छे रैप राइटर हैं| बधाई हो!

    rajkamal के द्वारा
    October 1, 2010

    चातक जी ..नमस्कार ! लैला कोई हूर परी नहीं थी …अगर किसी ने मजनू से कुछ कहा तो उसको हरबार एक ही जवाब मिला की …. मेरी अक्ख नाल वेख …तेरी अक्ख नहीं वेखन वाली … यह तो आपकी जरानवाजी है कि आपने मुझ नाचुज के लेखो में भी कोई सुर ताल पाया … आपकी रसमय टिपण्णी के लिए हार्दिक धन्यवाद

Dharmesh Tiwari के द्वारा
October 1, 2010

नमस्कार राज कमल जी………..न होता यारो को तब कोई ऊँच और नीच का भेद रिश्तों की मर्यादा भंग होने पर तनिक भी न होता खेद…………..एक जबरदस्त प्रस्तुती,बधाई

    rajkamal के द्वारा
    October 1, 2010

    प्रिय तिवारी जी …नमस्कार ! आपने ठीक लाइन चुनी है …. अजी सारा चक्कर तो इस नासपीटे दिमाग का ही तो है …. यही चढाऐ और यही गिराए. .. रिश्तों की गरिमा से ही आदमी की पहचान होती है इस ज़बरदस्त टिपण्णी के लिए धन्यावाद

NIKHIL PANDEY के द्वारा
October 1, 2010

राजकमल जी नमश्कार . बढ़िया हास्य रचना है लेकिन बहुत गंभीर अर्थ लिए है जैसा की आदरणीय शाही जी ने कहा की बिना गोता लगाये समझ नहीं आयेगा … तो गोता लगाना पड़ा……. बढ़िया रचना …

    rajkamal के द्वारा
    October 1, 2010

    निखिल जी …नमस्कार ! अजी साहब हमे तो आपकी इस जांबाजी + दिदाद्लेरी की दाद ही देनी पड़ेगी … जो की आप ने पानी की गहराई में उतरने का जोखिम उठाया … यह काम तो कोई कुशल गोताखोर ही कर सकता है …. एकाध किट हमको भी भिजवा देना भाई !…. शुक्रिया

Ramesh bajpai के द्वारा
October 1, 2010

ग्लोबल वार्मिंग का असली फायदा अब तो जानवर पूरा – २ है उठाते पहले केवल सर्दी में लेकिन अब तो हर मौसम में पिल्लै है नज़र आ जाते …. आज का आदमी जो कहीं जानवर से भी बदतर हो चला है   प्रिय राज कमल जी बस यही लिख ने का मन हो रहा है की मुंडा खूब समझ दार हो गया . बधाई

    rajkamal के द्वारा
    October 1, 2010

    आदरणीय वाजपाई जी ..प्रणाम खुदा से दुआ ….उम्मीद करता हू की आपकी उम्मीद पे खरा उतर पाऊ… आपकी इस उत्साह को बढाने वाली दिल से दी गई टिप्पणी के लिए दिल की पहली तह से शुक्रिया …

आर एन शाही के द्वारा
October 1, 2010

राजकमल जी सुबह-सुबह आपने हंसाकर मूड फ़्रेश कर दिया । लेकिन कितनी गम्भीरता छुपी है पंक्तियों में, बिना गोता लगाए समझ नहीं आ सकता । आज आदमी को अपने आदमी होने पर ही ग्लानि हो रही है, बिल्कुल सत्य है । हर कोई खुद को दूध का धोया और दूसरे को जवाबदेह साबित करने के प्रयास में मरा जा रहा है, जबकि सत्य ये है कि सारी कड़ियां जुड़कर ही जंज़ीर का रूप लेती हैं, जिसमें आज हम जकड़े हुए हैं । बहुत अच्छी पोस्ट … बधाई । ये लाइनें सारगर्भित लगीं — हर नर जानवर ही असल में एक असली मर्द होता है अजी साहब जानवरों में भी कभी कोई नामर्द होता है ….

    rajkamal के द्वारा
    October 1, 2010

    आदरणीय शाही जी …नमस्कार आप की दिल के उदगारो को व्यक्त करती हुई प्रेम से परिपूर्ण टिप्पणी मिली … और अगर यही बात किसी नर जानवर को कहेंगे … वोह तो यही कहेगा की …. ई तो महिमा राम की …इ मा हमरा का कसूर बा …. धन्यावाद


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